Section 304 Explained in Hindi: कब उम्रकैद और कब 10 साल की सजा?

Published On: January 17, 2026
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Section 304 Explained in Hindi, भारतीय दंड संहिता (IPC) की Section 304 उन मामलों में सबसे ज्यादा लगाई जाती है जहाँ अपराध murder नहीं होता है, लेकिन culpable homicide की श्रेणी में जरूर आता है।
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल हमेशा आते रहते है कि Section 304 में कब उम्रकैद की सजा होती है और कब 10 साल की सजा दी जाती है

Section 304 IPC क्या है?

Section 304, IPC को उस स्थिति पर लागू किया जाता है जहा पर कोई व्यक्ति culpable homicide करता है जो murder नहीं बनता है।
यानी ये सभी मामला Section 299 के अंतर्गत आते है, लेकिन Section 300 (murder) की शर्तें पूरी नहीं होतीं है।

इस section का मकसद यह तय करना है कि:

  • यह अपराध कितना गंभीर था
  • आरोपी की मंशा (intention) क्या थी
  • मौत किन परिस्थितियों में हुई थी

Section 304 को दो भागों में क्यों बाँटा गया है?

Section 304 को Part I और Part II में बाँटा गया है, क्योंकि हर culpable homicide की गंभीरता समान ही नहीं होती है।
कानून intention और knowledge के हिसाब से सजा में अंतर करता है।

Section 304 Part I: कब उम्रकैद या 10 साल तक की सजा?

Section 304, Part I तभी लागू किया जाता है जब:

  • आरोपी के पास मृत्यु की मंशा (intention) थी
  • या ऐसी ही चोट पहुँचाने का इरादा था जिससे मौत होना भी संभव था

इन सभी स्थिति में अपराध murder जितना गंभीर तो नहीं होता है, लेकिन काफ़ी गंभीर तो माना जाता है।

सजा क्या हो सकती है?

  • उम्रकैद, या
  • 10 साल तक की जेल, और
  • जुर्माना भी हो सकता है

अदालत परिस्थिति को देखकर ही तय करती है कि उम्रकैद की सजा दी जाए या सीमित अवधि की सजा देनी चाहिए।

Section 304 Part II: कब 10 साल तक की सजा?

Section 304, Part II तभी लागू किया जाता है जब:

  • आरोपी के पास हत्या की कोई मंशा ना हो
  • लेकिन उसे यह जानकारी अच्छे से थी कि उसका वह कार्य मृत्यु का कारण भी बन सकता है

यहाँ intention तो कमजोर होती है, लेकिन knowledge भी  मौजूद रहती है।

सजा क्या होती है?

  • 10 साल तक की जेल, या
  • जुर्माना, या
  • दोनों हो सकता है

यह punishment Part I से हल्की मानी जाती है।

Part I और Part II में मुख्य अंतर

Part I में:

  • मंशा (intention) अच्छे से स्पष्ट होती है
  • अपराध अधिक गंभीर होता है
  • उम्रकैद तक की भी सजा संभव है

Part II में:

  • मंशा नहीं होती है
  • केवल knowledge ही  होती है
  • सजा अपेक्षाकृत कम ही होती है

इसी अंतर के आधार पर भी अदालत फैसला सुनाती है।

Court सजा कैसे तय करती है?

अदालत कई अन्य बातों पर भी ध्यान देती है:

  • आरोपी का इरादा क्या है
  • हथियार की प्रकृति
  • चोटों की गंभीरता को देखकर
  • घटना से पहले और बाद का व्यवहार देखकर

इन सभी तथ्यों के आधार पर यह तय किया जाता है कि मामला Part I में का है या Part II का है।

IPC Sections & Chapters Explained in Hindi: Beginners के लिए Complete Guide – link

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