भारतीय कानून में विवाह की परिभाषा, भारत के समाज में अब विवाह को केवल एक मात्र सामाजिक परंपरा के रूप में ही नहीं देखा जाता हैं, बल्कि यह एक प्रकार की महत्वपूर्ण कानूनी संस्था में से एक होता है। विवाह के साथ व्यक्ति के सभी अधिकार, कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ ये सब कानून के दायरे में आ जाता हैं।
इसी कारण आपको यह जानना बहुत ही जरूरी हो जाता है कि भारतीय कानून, विवाह को किस तरीके द्वारा परिभाषित करता है और उस विवाह की कानूनी व्याख्या क्या है।
विवाह की कानूनी परिभाषा क्या है?
भारत के कानून के अनुसार यह विवाह दो व्यक्तियों के बीच माना जाता हैं यह एक ऐसा कानूनी संबंध है, जो की कानून द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर ही सही माना जाता है। फिर विवाह के बाद पति और पत्नी दोनों पर ही एक-दूसरे के लिए कानूनी अधिकार और दायित्व दोनों ही लागू हो जाते हैं।
यह संबंध केवल भावनात्मक ही नहीं है बल्कि पूरी तरह से law-governed relationship होता है।
क्या भारत में विवाह की एक ही परिभाषा है?
भारत में विवाह की कोई एक समान परिभाषा तो नहीं है। और सिर्फ इसका एक कारण यह है कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग Personal Laws लागू किए होते हैं।
हर व्यक्ति अपने धर्म अपने धार्मिक सिद्धांतों और परंपराओं के अनुसार विवाह को परिभाषित करते है, लेकिन सभी व्यक्ति को कानूनी मान्यता दे दी जाती है।
हिंदू कानून के तहत विवाह की परिभाषा
हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार, वर्ष1955 के अंतर्गत ही विवाह को एक पवित्र संस्कार माना जा चुका है। और हिंदू कानून के अनुसार विवाह धार्मिक रीति-रिवाजों के माध्यम से सम्पन्न कराया जाता है और इसे केवल एक अनुबंध ही नहीं माना जाता हैं।
हालाँकि, विवाह तभी वैध माना जाता है जब वह कानून के द्वारा निर्धारित शर्तों को अच्छे तरीकों से पूरा करता हो, जैसे विवाह की उम्र और सहमति को ध्यान में रख कर किया जाता हैं।
मुस्लिम कानून में विवाह की कानूनी स्थिति
मुस्लिम के कानून में विवाह को एक निकाह कहा जाता है। इसको भी कानून के दृष्टि से इसे एक सिविल अनुबंध (Contract) के रूप में देखा जाता है।
यहाँ विवाह को प्रस्ताव और स्वीकृति के आधार पर सम्पन्न करवाया जाता है और इसमें भी दोनों पक्षों की सहमति लेना बहुत ही आवश्यक होता है।
ईसाई कानून में विवाह की परिभाषा
Indian Christian Marriage Act के अनुसार, 1872 के अनुसार विवाह एक प्रकार की विधिक प्रक्रिया मानी जाती है, और जिसमें विवाह का चर्च और राज्य द्वारा पंजीकरण महत्वपूर्ण होता है।
ईसाई विवाह को कानून के द्वारा मान्यता तभी मिल सकती है जब वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विवाह को सम्पन्न किया गया होता हैं।
Special Marriage Act के तहत विवाह
Special Marriage Act, यह 1954 में उन लोगों के लिए बनाया गया है जो की धर्म से अलग होकर या अंतर-धार्मिक विवाह करने की चाह रखते हो।
इसको कानून के तहत विवाह एक प्रकार से पूरी तरह सिविल मैरिज ही होती है और इसमें किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज की अनिवार्यता नहीं ली जाती हैं।
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